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लौंडा शब्द जिसे बोलने मे आपको शर्म आती है उस लौंडा नाच से देश दुनिया मे नाम और शोहरत बटोर रहा सीवान का राकेश

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सिवान से अरविंद पाठक की खास रिपोर्ट
सीवान । भारत विविधताओ का देश है। देश मे सैकड़ो तरह के गायन, नृत्य और संगीत की शैलियों मे हजारों कलाकारों ने देश दुनिया मे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। लेकिन साथ ही कई प्राचीन नृत्य और गायन की शैली अब आधुनिकता की भेंट चढ़कर अपने अस्तित्व के संकट काल से गुजर रही है।

ऐसी ही नृत्य की प्राचीन शैली लौंडा नाच भी ऑर्केस्ट्रा के अश्लील आगोश मे समाकर मृत्यु शैया पर पड़ी है। लेकिन सीवान के ही एक कलाकार ने आज राज्य ही नही राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लौंडा नाच को जीवंत बनाए रखने में अपना अहम योगदान दिया है और नाम शोहरत भी कमा रहा है। या कहे तो सिवान जिले के राकेश कुमार ने राष्ट्रीय कला और रंगमंच पर इसे नए आयाम तक पहुंचाने के लिए अपने आप को खपा दिया है। राकेश के बेहतरीन प्रतिभा का गवाह बना सोमवार 7 नवंबर 2022 को कार्तिक पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर दरौली तट जहाँ पंचमंदिरा घाट के निर्माणाधीन रामजानकी धर्मशाला मंच से लौंडा नाच का मंचन कर सभी को अभिभूत कर दिया।

अश्लीलता का कहीं कोई भोंडा प्रदर्शन नहीं। गंगा स्नान को आए हजारों लोगों ने इसका आनंद उठाया और मुक्त कंठ से सराहना की तथा राकेश कुमार को इसे इंटरनेशनल लेवल पर पहचान दिलाने की शुभकामना दी। स्वागताध्यक्ष शशिकांत सिंह ने राकेश कुमार को अंगवस्त्रम भेंट कर उन्हें सम्मानित किया।लौंडा नाच बिहार की ऐसी ‘लोकनृत्य शैली’ है जिसमें पुरुष कलाकार औरतों के चरित्र को उनकी भाव भंगिमा में प्रदर्शित करते हैं। कला के क्षेत्र में बिहार की संस्कृति बड़ी उर्वर रही है। एक समय था जब यह काफी लोकप्रिय हुआ करता था। पूर्वांचल के भोजपुरी क्षेत्र में लौंडा नाच का आयोजन लोग किसी भी शुभ मौके विवाह,छठीयार आदि पर कराते। शिक्षक श्रीकांत सिंह ने कहा भोजपुरी के शेक्सपियर नाटककार, एक्टर व सूत्रधार भिखारी ठाकुर के नाच मंडली एक तरह से लौंडा नाच मंडली ही थी। जो आज हाशिए पर जा चुका है,अब गिने-चुने लौंडा नृत्य मंडलिया ही बची है, जो इस विधा को जिंदा रखने के लिए जद्दोजहद कर रही हैं। राज किशोर सिंह उर्फ राजू सिंह ने कहा कि दरअसल इस शैली को अश्लीलता की नजर से शुरू से ही देखा गया।

इसे गहराई से जानने की कोशिश नहीं की गयी,जो जानकारी हासिल की गयी वह समाज के प्रचलित धारणा के अनुरूप रही।फलस्वरूप इस शैली को लाभ की तुलना में हानि ज्यादा हुई। इस नृत्य शैली को लेकर अब जाकर कुछ नजरिया बदला है। ‘समर्थ’ के अध्यक्ष विंध्याचल राय ने बताया सिनेमा और आर्केस्ट्रा के आ जाने से इसे काफी नुकसान हुआ।

 

सामाजिक दंश झेल रहे बिहार के लोक नृत्य ‘लौंडा नाच’ के प्रति उदासीनता ने इसे कमजोर बनाने का काम किया है। वक्त की मार झेल रहे इस शैली के कलाकारों को प्रोत्साहन की जरूरत है। सचिव नंदकुमार ओझा का मानना है कि कभी विस्तृत रही यह शैली आज अपनी बेहतरी की राह देख रहा है। इस शैली को प्रापर संरक्षण की आवश्यकता है।

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