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सारण: स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए पोषण व्यवहार में  परिवर्तन आवश्यक

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बिहार न्यूज़ लाइव /सारण डेस्क: स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए पोषण व्यवहार में  परिवर्तन आवश्यक

• स्वस्थ बच्चा स्वस्थ समाज की आधारशिला
• लिंग आधारित भेदभाव पोषण में बाधक
छपरा। स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए पोषण व्यवहार में परिवर्तन आज एक आवश्यकता बन गई है। जीवन शैली के बदलाव से सामने आई कई बीमारियां हमारे लिए चुनौतियां बन गई हैं। भोजन में पोषक तत्वों के अभाव ने लोगों की प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर दिया है। बात जब खाने की आती है, तो एक ही घर में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर साफ दिखाई देता है। महिलाएं सबसे आखिर में और बचा-खुचा, प्रायः अपर्याप्त खाती हैं। पोषण की क्रांति तभी संभव है जब महिलाओं के पोषण को एजेंडा में शामिल किया जाए। आमतौर पर घर के बाहर पुरुष का राज होता है और घर के भीतर महिलाओं का। अधिकांश घरों में महिलाएं ही रसोई संभालती हैं और पूरे परिवार के पोषण का ख्याल रखती हैं। रसोई में राशन की व्यवस्था से लेकर हर दिन ‘क्या बनेगा’ तक महिलाएं ही निर्णय लेती हैं। लेकिन जब बात समुचित आहार की आती है तो एक ही घर के पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर दिखाई देता है। महिलाएं घरों में सबसे आखिर में खाना खाती हैं और जो बच जाता है, वही खाती हैं, प्रायः कम भोजन बचने पर वही खाकर संतुष्ट हो जाती हैं। लेकिन इन व्यवहारों में परिवर्तन लाना होगा।

 

 

पुरूषों को निभानी होगी जिम्मेदारी:
एक पुरूष की जिम्मेदारी होती है कि रसोई की सभी सामग्री को बाजार से लेकर आये। ऐसे में पुरूषों को अपनी जिम्मेदारी को निभाना होगा। बाजार से पौष्टिक तत्वों को लाना होगा। पोषण युक्त खाद्य सामग्री घर तक पहुंचेगी तभी घर की महिलाएं आपके थाली में पौष्टिक आहार परोसेगी। सामाजिक प्रगति के बावजूद आमतौर पर महिलाएं उसी व्यवस्था का अनुसरण कर रही है जो पुरुषों ने बनाई है। वर्ग और जातीय वर्गीकरण से पितृसत्तात्मक व्यवस्था की पकड़ और मजबूत होती है जिससे महिलाओं के लिए भेदभाव से बचना और भी मुश्किल हो जाता है। लड़कियों को अक्सर दोयम दर्जे का समझा जाता है, उन्हें जरूरत भर का भोजन इसलिए मिलता है ताकि वे पत्नी और मां बन सकें।

 

स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति उनके जीवन की गुणवत्ता का केंद्र:
आईसीडीएस के जिला कार्यक्रम पदाधिकारी अनुपमा सिन्हा ने बताया कि महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण की स्थिति उनके जीवन की गुणवत्ता का केंद्र है। यह देश की भावी पीढ़ियों के अस्तित्व के लिए भी जरूरी है। आज यह निर्विवाद रूप से साबित हो चुका है कि महिलाओं के पोषण स्तर में सुधार का प्रभाव शिशु के जन्म और बच्चे की लंबाई के तौर पर दिखाई देता है। लड़कियों की किशोरावस्था में ही पोषण सुधार शुरू करना होगा। खराब स्वास्थ और बीमारियों के लिए जिम्मेदार कई सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने के लिए स्वास्थ्यवर्धक भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच बहुत महत्वपूर्ण है।

 

क्या है आंकड़ा:
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 2019-20 के आंकड़ा के अनुसार जिले में पांच वर्ष के अंदर के 45 प्रतिशत बच्चे कम वजन के है। वहीं पांच वर्ष के अंदर के 39.7 प्रतिशत बच्चे छोटे कद के है। वहीं 15 से 49 वर्ष तक की 62.8 प्रतिशत व 15 से 19 वर्ष तक 70.9 प्रतिशत महिलाएं एनिमिया से ग्रसित है।
लैंगिक भेदभाव और स्वास्थ्य लापरवाही से होता है कुपोषण:

बालकों और बालिकाओं दोनों के कुपोषित होने की संभावना लगभग एक सी ही होती है। लेकिन बालिकाओं के लिये पौष्टिकता ग्रहण, गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही मामले में अपेक्षाकृत कम है।

 

कच्ची आयु में गर्भधारण और बार-बार गर्भधारण के अतिरिक्त बोझ के कारण भी बालिकाओं का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। समाज की पितृसत्तात्मक प्रवृत्ति के कारण बालकों को अपेक्षाकृत अधिक पौष्टिक भोजन दिया जाता है क्योंकि उन्हें परिवार का कमाऊ भविष्य माना जाता है, विशेष रूप से यदि परिवार गरीब हो और सभी बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की स्थिति में नहीं हो। प्रजनन काल के दौरान महिलाओं की खराब पोषण स्थिति बच्चों के अल्पपोषण के लिये ज़िम्मेदार है।

 

 

 

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